नियम

देखा होगा, इन दरख्तों ने भी
बहारों का मौसम, जाते हुए
है देखा नहीं, इनको मगर
इंसानों की तरह, रोते हुए 

सुलग जाता है, सागर भी
बारिश बनके बरसने के लिए, 
इंसानों को, बहोत कम देखा है,
यूं दरियादिली दिखाते हुए..

है छुप जाता, सूरज भी,
रातों की, चांदनी के लिए,
देखा है बस, कुछ लोगों को ही,
यूं छुप कर भी जगमगाते हुए

है नियम अनगिनत, बनाती ये दुनिया,
बनाके इनको, है मिटाती ये दुनिया,
है डरती मगर, ये कुदरत के,
नित्य नियम पे चलते हुए..

देखा होगा, इन दरख्तों ने भी
बहारों का मौसम, जाते हुए
है देखा नहीं, इनको मगर
इंसानों की तरह, रोते हुए


- सत्यदेव - मेघ

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