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ज़िन्दगी

कश्मकश, ज़िन्दगी, अजीब शख्स, ज़िन्दगी.. कभी धुआं है, ज़िन्दगी,  कभी है अक्स, ज़िन्दगी.. कभी बवाल, ज़िन्दगी, कभी करार, ज़िन्दगी.. करे सवाल, ज़िन्दगी, रहे सवाल, ज़िन्दगी.. कभी अकेली, ज़िन्दगी, कभी सहेली, ज़िन्दगी.. कभी है  प्यास , ज़िन्दगी, कभी बरसात, ज़िन्दगी.. कभी है ठाठ, ज़िन्दगी, कभी फुटपाथ, ज़िन्दगी.. कभी जवां, है ज़िन्दगी, कभी फ़ना, है ज़िन्दगी.. कभी रुकी, है ज़िन्दगी, कभी रवाँ, है ज़िन्दगी.. पहेली है, ये ज़िन्दगी, तू ही बुझा, ऐ ज़िन्दगी.. उम्मीद पे, मेरी खरी, कभी उतर, ऐ ज़िन्दगी.. - सत्यदेव - मेघ

मेरा भारत

अखंड है, प्रचंड है,  हम सब का तू घमण्ड है.. तू आसमां अनंत है,  हम झूमते विहंग हैं.. तू डोर एक प्रेम की, ये जग तेरी पतंग है.. तेरे ज्ञान की विरासतों पे  विश्व सारा दंग है.. तेरा नाम है उदारता, अध्यात्म तेरा ढंग है.. तू विश्व के इस चित्रपट पे,  खास एक प्रसंग है.. सहे चारों ही दिशा से तूने घात कुछ प्रचंड हैं.. पर गर्व तुझपे है के तू,  बेढंग ना दबंग है.. वर्षों से एकता तेरी,  सम्पूर्ण है अभंग है.. रहते सभी मिलकर यहां, जितने भी सारे खंड हैं.. ऐसा नहीं के सब यहाँ, ठीक है, सुढंग है.. चल रही है आज भी  दरिद्रता से जंग है.. हैवानियत का फिर कभी,  जागता भुजंग है.. हम जानते हैं, ये तेरी महानता का भंग है.. तो उठ ओ देशवासी, इसका  करना कुछ प्रबंध है.. ख़त्म कर इसे अभी,  तेरे मन में जो भी द्वन्द है.. होने न दें, फीका कभी,  ध्वजाओं का जो रंग है.. वतन के कोने कोने में, लगाना राम रंग है.. तू अंग है इस देश का, ये देश तेरे संग है.. - सत्यदेव - मेघ

चल, निभा लेते हैं ये रिश्ते

तेरी मेरी मर्ज़ी से, जुड़े थे ये रिश्ते, अब इस मर्ज़ी के, मोहताज नहीं ये रिश्ते तू मुझसे, या मैं तुझसे, कितना भी झगड़ लूँ, इस तकरार से, नहीं डगमगाते ये रिश्ते, हम दोनों के अहम् की, दीवार, ऊँची है बहोत, इन दीवारों से भी खूब, ऊँचे, हो गए हैं ये रिश्ते.. बात सिर्फ तेरी मेरी, अब रही कहाँ है, इस रिश्ते में से, कई, और बन चुके हैं रिश्ते.. इसी बात पे, मेरे हाथ में अपना हाथ रख दे,  लड़ते झगड़तेे सही, चल निभा लेते हैं ये रिश्ते.. - सत्यदेव - मेघ

खुदा बना बैठे हैं

सब कुछ, बर्बाद कर रहे हैं, चंद लोग,  जो दौलत को, खुदा बना बैठे हैं.. कुदरत की बनाई दुनिया को,  लेन देन का, बाज़ार बना रखे हैं... खामोश खड़े, पर्बत जंगल, काट कर,  शोरगुली, कारखाने बना रखे हैं.. हवाओं को ज़हरीला बनाकर, इसकी ताज़गी को लुटे हैं.. देह को व्यापार बनाकर इसकी पाकीज़गी को लुटे हैं.. इस पर क़यामत ये है,  हम इनको खुदा बना बैठे हैं.. सब कुछ, बर्बाद कर रहे हैं, चंद लोग,  जो दौलत को, खुदा बना बैठे हैं.. - सत्यदेव - मेघ

नियम

देखा होगा, इन दरख्तों ने भी बहारों का मौसम, जाते हुए है देखा नहीं, इनको मगर इंसानों की तरह, रोते हुए  सुलग जाता है, सागर भी बारिश बनके  बरसने  के लिए,  इंसानों को,  बहोत  कम देखा है, यूं दरियादिली दिखाते हुए.. है छुप जाता, सूरज भी, रातों की, चांदनी के लिए, देखा है बस, कुछ लोगों को ही, यूं छुप कर भी जगमगाते हुए है नियम अनगिनत, बनाती ये दुनिया, बनाके इनको, है मिटाती ये दुनिया, है डरती मगर, ये कुदरत के, नित्य नियम पे चलते हुए.. देखा होगा, इन दरख्तों ने भी बहारों का मौसम, जाते हुए है देखा नहीं, इनको मगर इंसानों की तरह, रोते हुए - सत्यदेव - मेघ

मुनाफा

हर रोज़ दुकान खोलता हूँ, हर रोज़ मुनाफा हो, ये ज़रूरी नहीं, बेचने को, बहोत सामान पड़ा है, हर सामान बेचूं, ये ज़रूरी नहीं, बरनी में रखी, मीठी गोलिया, यूंही दे कर, बच्चों की मुस्कान में सुकून पाता हूं। जीवन के, बही खाते में, इस तरह, कुछ मुनाफा कर लेता हूँ.. - सत्यदेव - मेघ

चलचित्र

ये जीवन मुझे, सारा अपना... चलचित्र सा है नज़र आता.. अभिनेता नहीं उसमें, स्वयं को, हूँ मूक दर्शक सा मैं नज़र आता.. होना था जो, वही है हुआ, मैं कितना भी जतन करता उम्मीदों की, नाव में बैठा,  चाहे, जितना भी भ्रमण करता.. मर्ज़ी से, आते नहीं जग में, न अपनी, मर्ज़ी से हम जाते,  जीवन का ये भेद जानकर  फिर क्यों हम अहम् जगाते.. ये जीवन मुझे, सारा अपना... चलचित्र सा है नज़र आता.. अभिनेता नहीं उसमें, स्वयं को, हूँ मूक दर्शक सा मैं नज़र आता.. - सत्यदेव - मेघ